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कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक जी के लिखल भोजपुरी कहानी लोहा बाबा

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कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक
कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक

ए लोहा बाबा काल्ह सुमितरी खातिर लइका देखे जायेके बा रउआ चलेम नु रामदेयाल कहलन। लोहा बाबा कान पो जनेव चढ़वले लोटा लेके खेत में दुलुकिये चाल से जात रहन एह से कुछ बोललन ना खाली हाँ में मुड़ी हिला देले ।रामदेयाल समझ गइलन आ बाबा के दलानी पो जाके राह देखे लगलन। फराकित होके बाबा जब अइनी त रामदेयाल पो बरस गइनी , अरे नालायक ! तोरा इ ना बुझाला कि कब केकरा से का बोले के चाहीं, का भइल बाबा कवनो भादारा भा पाचाखा चढ़ल रहे का कि बतियावे के मुहुरत ना रहे रामदेयाल बात के काट देलन। बाबा अवरू भिनभिना गइले कहले कि जब हाकिम के अडर आ जाला त पिउन लोग पंजरा से हट जाला आ तें राहता में आके बाधा डालत रहले।आच्छा बाबा समझ गइनी गलती हो गइल ।

काल्ह सुमितरी खातिर लइका देखे जायेके बा चलेम नु। का हमार गइल जरूरी बा पहिले तोहनी देखल सन बाद में ठीक करे के बेर हम चलेम।ना बाबा रउआ चलेके बा पसन पर जाई त बरछेया भी आजे क दिआई। बाबा तैयार हो गइलन।

बाबा के असली नाम पंडित गिरधारी पान्डेय रहे लेकिन उ नाम धराँ रहे सभे लोहा बाबा के नाम से जानत रहे।कबो कबो बहर के आदमी बाबा के खोजत गाँव में आवे आ पुछे पंडित गिरधारी पान्डेय के कवन घर ह त केहु ना बतावे हार थाक के उनका लौट जायेके पड़त रहे।लोहा बाबा लोग असहीं ना कहत रहे बचपन में बहुत जिद्दी रहले जवन एक बेर मन में ठान लेत रहले तवन बात मनवा लेत रहन आ जबान के पक्का रहन आ उ आदत बुढ़ारियो में बा ।कवनो उलझन होखे गाँव में सबके समाधान रहस लोहा बाबा देह धाजा से पकठाइल आ चेट से भी चहकत रहन। गाँव के का जवार के भी लोग लोहा बाबा के लोहा मानत रहले। आ परतोख दियात रहे आदमी होखे त लोहा बाबा जइसन।कवनो जादा पढ़ल लिखल त ना रहन चौथा कलास तक हीं स्कूल के मुँह देखले रहन महटर साहेब एक दिन ना पढ़ला खातिर धुन देले रहले ओह दिन से उनकर पढ़ाई से मन भागल त भागले रह गइल । बाप के एकलौता संतान आ खेत बधार चालीस बिगहा , का कमी रहे ।

ना पढ़लन त ना पढ़लन केहु से कम थोड़े बाड़न उनकर बाबूजी मूँछ पो ताव देके कहत रहले।जवानी में जब अपना पो भइलें त जम के खेती करस चरबरधिया हर चलत रहे आ दुआर पो चार गो बड़के बैल दु गो भंइस ए गो गाय सालो भर शोभा बढ़वत रही सन। दु गो चरवाहा आ दु गो हरवाह बाबा के अपना परिवार के अंग रहसन। बाबा केहु के साथ दु भाव ना करत रहन जवन अपने खास उहे बनिहारन के भी खियावत रहन। दूध दही पर भी बनिहारन के ओतने हक रहे जेतना बाबा के इहे सब गुन से बाबा के लोग जान से जादा मानत रहे।

लोहा बाबा के बाबुजी बढ़िया पंडित रहन उनका पंडिताई बिरासत में मिलल रहे, लोहा बाबा भी बाबूजी के साथे अंगेया खाये जात जात दुचार गो श्लोक इयाद कर लेले रहन आ ओकरे के हमेशा सुतले बइठले दोहरावत रहन , गाँव के लोग त जादा पढ़ल लिखल रहे ना आ उनका के श्लोक पढ़त देखके विद्वान समझे लागल फिर का लोहा बाबा के विद्वता के सटिफिकेट मिल गइल। जब उनका बाबूजी के गंगालाभ हो गइल त सब जिम्मेदारी लोहा बाबा पो आ गइल , खेती बारी , जर जजमनिका, हित नाता बाहर भितर सभ देखेके परत रहे।बाबा घर के इकलौता संतान होखेसे अपना मन के राजा हो गइल रहलें ओही राजशाही में एगो आदत पकड़ लेलन गाँजा पियेके आ उ गांजा के गुलाम हो गइलन। ओह समय गाँजा के लोग राजसी नशा कहत रहे काहें से कि असली पियक्कड अपना साथे दु चार गो अवरू फोकटिया पियक्कड़ राखत रहे जे से कि ओकर बादशाहत बरकरार रहत रहे ।आ उ सब फोकटिया पियक्कड़ अपना गुरू के छाया रहत रहसन। लोहा बाबा के भी चार गो फोकटिया पियक्कड़ रहे लोग जेकरा के बाबा शंकरजी के गण कहत रहन। अकसरहाँ गाँजा पियेवाला गाँजा के शंकरजी के बूटी कहेला लोग ।

बिहान खानी लोहा बाबा अपना चारो गण के साथ रामदेयाल के अगुअइ में चल देलन भर रहता बर बाजार पो बैठकी लगावत सांझ के लइका वाला के दुआरी पर पहुँच गइलन। अगुआ जान के खूब खातिरदारी भइल। रात त असहीं हाल समाचार पुछे में बित गइल बिहान भइला पो अगुअइ के काम शुरू भइल। लइका के बाबूजी के बोलाके लोहा बाबा बात शुरू कइलन , पहिले आपन परिचय देलन कि हम रामदेयाल के पुरोहित हईं, एही बिच में चारो गण में से एगो कहलस कि बाबा जइसन विद्वान रउआ ढ़िबरी लेके खोजब तबहुँ ना मिलिहें। बाबा ओकरा के चुप कराके बात आगे बढ़वलन आ पुछलन , खेत बधार , सवांग , गोत्र सब पुछला के बाद असली बात पो अइलन कहलन कि राउर का मांग बा। एह पो लइका के बाप आपन बड़ाई के पुल बाँध के बीस हजार रूपेया के मांग ठोक देलन, बिना जनले कि केकरा से बतियावत बानी काहें से कि आज तक लोहा बाबा के बात में केहु ना हरा पवले रहे आ कवनो गलत बात ना नु बोलत रहन साँच के अइसन परोसत रहलन कि लोग उल्टी कर देत रहे। कहलन बीस हजार रावा अपना औकात से जादा नइखीं मंगले , अइसन स्पष्ट आ खरा बात के लइका के बाप के अंदाजा न रहे कि केहु असहुँ बोली, “अभी त लोहा बाबा के बात के हथौड़ी चलल बा हथौड़ा त अभी बाकिये बा ।”

लइका के बाप कहलन कि हमरा का कमी बा घर दुआर देखते बानी खेती बारी सब ठीके बा लइका देह धाजा से केहु से कम नइखे त कहें ना हम बीस हजार मांगब । ठीक कहनीहा रावा घरे सब बा बाकिर मुँह मत खोलवाईं रउआ पाँच हजार से जादा लायक नइखीं , इ बात सुन के लइका के बाप के तितिकी लाग गइल आ एने माहौल गरम देख के बाबा के गण तैयार हो गइल बाबा के ईशारा खातिर कि ईशारा मिले त पूर्णाहूति कर दीं। लइका के बाप बाबा के तेवर भांप गइलें आ ताव में कहले कि का कमी बा हमरा में जे हम पाँच हजार लायक बानी ।

बाबा आपन आवाज मोलायम क के कहलन देखीं कमी त सभके में बा हमरो में बे रउओ में बा रामोदेयाल में बा त छोड़ी उ सब बात के आ हई लिहीं पाँच सौ के बरछेया आ शादी पाँच हजार पो तय करीं। बीस से एको छेदम कम ना होई दहाड़ के लइका के बाप कहलें , एह पो बाबा के हथौड़ा चलावे के परल आ कहलें सुनी हम बीस ना पचीस हजार देब लाकिन हम राउर परीक्षा लेब पास हो जाइब त पचीस देब आ ना त पाँच में शादी करे के परी।

लइका के बाप अपना जिनिगी में अइसन खरा आ स्पष्ट बोलेवाला आदमी ना देखले रहले कुछ देर तक सन्न रह गइलें फिर अपना भूत वर्तमान पर नजर दौड़ाके आपन कमी के देखे के कोशिश कइले त अपना अंदर कवनो कमी ना लउकल तबहुँ सहम के बाबा से कहलन ठीक बा लिहीं हमार परीक्षा बाकि अपना बात से पीछे मत हटब । एने रामदेयाल के भी ओह परिवार में कवनो कमीं ना लउकत रहे त बाबा के कान में जाके कहलन कि छोड़ी लोहा बाबा जाये दीहीं हम बीस हजार देबे खातिर तैयार बानी, उ सोचलन कि खांमखां पाँच हजार के घाटा बबवा लगा रहल बा का कमी बा ओह परिवार में। बाबा रामदेयाल के डपट देलन कहलन कि फेर हमरा के काहें खातिर ले आइल रहस जब सभ तोरा अपने से करेके रहे आ जब ले आइल बाड़े त चुप रह आ देखत रह केंग इ रहता पो आवत बाड़े। ते पाँच के इंतजाम कर शादी पाँचे में होई। रामदेयाल माथा पीट लेलन मन हीं मन बाबा के ले अइला पर पछतावे लगलन बाकि का कइल जाव जवन होई तवन देखल जाई , आ इहो भरोसा रहे आज तक केहु बबवा के हरवले नइखे इ सोच के खुश भी होत रहन।

लइका के बाप के पचीस हजार लउके लागल एहसे दाँव खेले पो तैयार हो गइलन , वैसे हर जुआड़ी अपना जीत के दावा करेला बाकि केहु आज तक जुआ से अमीर नइखे भइल लुटाइले बा।लइका के बाप भी उहे गलती कइलन आ लोहा बाबा के प्रस्ताव सकार लेलन। लोहा बाबा फिर से कहलन सोच विचार के कहीं इ ना कि बाद में नाकार जाईं। इ मर्द के जबान ह कवनो छुछबेहर ना हईं जे अपना बात से मुकर जाइब। तब बाबा पुछलन खि रउआ परिवार में क गो सवांग लोग बा एहपर लइका के बाप जोड़के बतवलन कुल मिलाके पंद्रह गो जे में तीन जाना बाहर रहेलन दुगो लइका लोग कवलेज में पढ़ेला गाँव पो दस आदमी बा। तब लोहा बाबा कहलन कवनो बात ना दसो आदमी जे गाँव पो रहेला अपना अपना पैर में पनही पहिर के हमरा सोझा आईं सभे हम पचीस गिने खातिर तैयार बानी ।एतना सुनते लइका के बाप सन्न रह गइलन काहें से कि ओह घरी परिवार में एक दु गो जूता किनात रहे अधिकांश लोग खालए पैर चलत रहे ना त काठ के चटकी।

सुखी संपन्न आदमी हवाई चप्पल पहिरत रहे। लइका के बाप कहलन इ त कवनो बात ना ह रउआ त जानते बानी केहु जूता ना पेन्हेला ए जो दु गो जूता होला आ जेकरा कहीं हितई नाता में जाये के होला उ हे पहिर के जाला बाकी समय में कपड़ा में बान्ह के ताखा पो रखा जाला, फिर कभी टोला परोसा के जेकरा जरूरत परेला उ पालिस करवा के पेन्हेला।अक्सरहाँ लोग जे हितई में जाय रहे उ जूता पालिस करवा के झोरा में रख लिही आ गाँव के गएड़े जा के पेन्हत रही जादा से जादा एक किलोमीटर जूता पहिरल जाय रहे। ओतने में जूता गोड़ काटके फिर से झोला में आसीन हो जात रहे।

लोहा बाबा जीत गइल रहले लइका के बाप के इ कतई आशंका ना रहे कि केहु अइसनो सवाल पूछी चूँकि जबान हार गइल रहलें एह से शादी पाँचे हजार में तय करे के पड़ल।

लेखक: कन्हैया प्रसाद तिवारी रसिक जी

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