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शशि रंजन मिसिर जी के लिखल गोधन के बहाने

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शशि रंजन मिसिर जी
शशि रंजन मिसिर जी

“बड़का भैया मर जास, उधिया जास ! हमार सब भाई मर जा स… कवनो भाई भतीजा के जरुरत नईखे, सब जाना मर-उधिया जास |”

भोरहिं भोरे विभा फुआ ओसरा में बईठ के सरापत रही | मय खानदान के मरे आ बिपत करे के सराप उनका मुन्हे सुने के भेंटाईल | हमरा कुछो बुझाईल ना, कि इ काहे खिसिआयिल बाड़ी…

“का हो फुआ, भोरहिं से काहे पितपितायिल बाडू, का भईल ?”
“आगलगवना तुन्हू मर–उधिया जो, बिपत पड़ो तोरा पर..”

हमरा बुझाईल ना… त आजी से पूछनी कि फुआ के कवन ब्रह्म धईले बा ? उ बतइली कि आज गोधन ह, आज सभे के सरापे के बिध ह |

इ कईसन बिध ए भाई ! जवना में गरिआवे के छुट होखे | हमनी किहाँ होली में गाली-गलौज त परब के सोहाग-भाग मान के पचा लेला लोग |
बाकी इ कईसन परब जवना में मय खानदान के नाश करे के सराप… !!!

नौ-दस बजे ले फेर गोधन कुटायिल | हमनी के लायिकायीं में गोधन फाने के बड़ी शौख रहे | गिनती इयाद नईखे की केतना बेर फाने के रहे बाकी हमनी के सभ लईका कम्पटीशन में फानत रहब जा | ओहिजा ईगो नया चीज देखे के भेंटाये- सब औरत लोगन आपन जीभ में रेंगनी के कांट गडावे आ कहे-
जवना जिभिया से गारी दिहनी, ओह जिभिया में कांट गड़ो |

फेर हमनी के बजरी आ बूंट निगले के मिले | इ हमरा खेल बुझात रहे बाकिर जब समझदारी भईल आ पढ़े लिखे लगनी त हमार चाचाजी के लिखल ईगो किताब पढ़े के मिलल – योग और आप (लेखक –डा० रविन्द्र कुमार पाठक, गया बिहार) | एह किताब में उन्हा के इ गोधन के चर्चा कईले बानी, जवना के एहिजा हम दे रहल बानी |

हमनी के इंहा के सभे परब में कुछ ना कुछ वैज्ञानिक बात छुपल रहेला |
पहिले समाज में औरतन के स्थिति ठीक ना रहे | पुरुषप्रधान समाज में चारदीवारी के भीतर औरतन में क्रोध, कुंठा, अवसाद , मानसिक विकार पनप जात रहे |

इ विकार अईसन हवें की इनका के निकालल न जाई त शरीर में रोग-व्याधि लईहें | पहिले के गुनी लोग एकर काट में एह गोधन कूटे के परब बना देल लोग | एह दिन औरतन के मय मानसिक विकार आ क्रोध सराप के निकालल जाई आ फेर गोधन कुटाई | अब गोधन के भी हाल विचित्र- औरतन के प्रचंड क्रोध के रूप एहिजो देखीं |

गोबर से चौखुट बक्सा में यम-यमिन बनावल जाला | यम मृत्यु के देवता हवें त सबसे ज्यादे क्रोध उनके पे | उनका आ उनका मेहरारू के गोबर से एक दूसरा से उल्टा लेटा के बनावल जाई |

हिन्दू धरम में मर्द मेहरारू के एक साथे एह तरह रहे के मनाही बा | बाकी एहिजा मामिला त क्रोध के बा त सभे धरम उलट पलट दियाई |
झाँवा इंटा सबसे बरियार मानल जाला, उहे बीच में रखाई |

फेर सब औरत सब मिलके मूसल आ लाठी से उ इंटा के मार मार के फोड़ दिहें , यम–यमिन के दुर्गत हो जाई | अब जवन पर क्रोध निकाले के रहे ओकर नेस्तनाबुत हो गईल त क्रोध शांते नु हो जाई | अब बाकी का बा !?? त पछतावा बा !!!

रेंगनी के कांट से अपना के प्रताड़ित करे के आ कहे के -जवना जिभिया से गारी दिहनी , ओह जिभिया में कांट गड़ो |

पछतावा के बाद सब औरत लोग आपन भाई-भतिज के आशीर्वाद दिही आ बज्जरी खियाई की इनका लोग के देह बज्जर बनो |
“कवन भइया चलले अहेरिया, कवन बहिनी देली आसीस जिअसु हो मोरा भइया, जीअ भइया लाख बरिस

त इ गोधन के तनिको अबर-दुबर परब मत समझीं, यम के भी मिटा देवे अईसन क्रोध साधना के परब ह |

लेखक: शशि रंजन मिसिर जी

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