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एगो रहलन रसुल मियां | संजीव कुमार सिंह

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संजीव कुमार जी
संजीव कुमार जी

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, आयीं पढ़ल जाव संजीव कुमार जी के लिखल रसुल मियां के जीवनी , रउवा सब से निहोरा बा कि पढ़ला के बाद आपन राय जरूर दीं, अगर रउवा संजीव कुमार जी के लिखल आलेख अच्छा लागल त शेयर जरूर करी।

रसुल मियां:
“ई बुढ़िया जहर की पुड़िया
ना माने मोर बतिया रे
अपना पिया से ठाठ उड़ावे
यार से करे बतिया रे”

नाच में ई गितिया गवाईल रहे, धीरे धीरे ई गितवा हथुआ राजदरबार में चल गईल। महारानी ई बात सुन के बहुत गुस्सा में आ गइली ,जे गवले रहे ओकरा पकड़वा के कोड़ा लगावल गईल। आगे के दु गो दात टुट गईल, दरबार मे पुरोहित जी (श्री परीक्षण तिवारी जी) के मोह लागल,कहलन छोड़ द.. छोड़ द…,फेरु पूछलन की सही सही बताव की ते काहे गवली ह, त लटपटात आवाज में कहलन की हम विक्टोरिया महारानी के बारे में गवनी ह। तब ई बात स्पष्ट भइल की ई देश भक्ति में बाड़न औरि एहीसे ई अंग्रेजन के भगावे खातिर गवले बाड़न। तब हथुआ के महारानी खुश भइली औरि उनके इनाम और कई बीघा के खेत के पट्टा काट के दे दिहली। उ व्यक्ति के नाम रहे “रसुल मियां”।

रसुल मियां : भोजपुरी के अमिट औरि गुमनाम साहित्यकार, रंगमंच कर्मी, नाटक सृजनकर्ता, गीतकार

हमर ई लेख, हमार बाबुजी की कहानियों, श्री सुभाष चन्द्र कुशवाहा के शोध पत्र, डायट थावे के शिक्षक श्री गोरख नाथ यादव एवं हथुआ राज के छोटा दरबार के पुरोहित स्वर्गीय श्री परीक्षण तिवारी के प्रपौत्र श्री पंकज कुमार तिवारी(तिवारी मटिहनिया, गोपालगंज) के बात चीत पर आधारित बा।

जनश्रुति के अनुसार, रसुल मियां, मूल रूप से मैरवा के रहलन। मीरगंज के लगे जिगना ढाला मजार पर आपन अड्डा बनवले रहलन। लेकिन कुछ लोग ई भी कहेला की रसुल के जन्म गोपालगंज के मीरगंज के जिगना मजार टोला में गुलाम भारत मे आदरणीय भिखारी ठाकुर जी के जन्म से 15 साल पहिले भइल रहे। लगभग 1872 के करीब में। रसुल 5वी तक पढ़ले रहलन। रसुल के अब्बा फतिंगा अंसारी गाये बजाये के काम करत रहलन।

उनकर दादा भी संगीतकर रहलन। उनकर चाचा मोहर्रम मियां औरि गौहर मियां सारंगी बजावत रहे लो। उनकर फूफा तुना मियां भी सारंगी बजावस। रसुल के संगीत औरि नाच गान के प्रारंभिक ज्ञान, उनकरा अपना अब्बा औरि परिवार के लोग से मिलल। अब्बा के पेशा के चुन के रसूल आपन नाच के एगो नया शैली शुरू कइलन।पुरनका नाटक विधा के छोड़ दिहलन औरि अपने खुदे नाटक लिखस,औरि नाटक के लोकप्रिय बनावे खातिर खुद से संवाद लिखस औरि अपने से गीत भी लिखस औरि गीत के गावस भी।

रोजी रोटी के तलाश में अपना इहा के ढेरे लोग,पूरब की तरफ रुख कइल लो। चटकल जुट फैक्टरी कलकत्ता में बिहारी औरि पुरबिया मजदूरन के भरमार रहे।रसुल के अब्बा फतिंगा अंसारी भी अंगरेजन के इहा, कलकत्ता छावनी(मार्कुश लाइन) में बावर्ची के काम करे लगलन।कलकत्ता में रसुल के डेरा छावनी में लागे, ओहिजन उ बिहारी लोगन के बीच जाके आपन नाच दिखावल करस। रसुल पर भी देशभक्ति चढल रहे। रसुल के गीत सुन के, कई गो बिहारी सिपाही लोग आपन नौकरी छोड़ दिहल लो, ई बात अंगरेजन के पता चलल, अंगरेजन के लागल की रसुल के चलते ई बिहारी सिपाही नौकरी छोड़ले बाड़न, त उनके गिरफ्तार कइल गईल। रसुल के जमानत उहा के नाच गावे वाली दिहल लोग।इहा तक कि पास के नवाब के बेटी भी जमानत ला, गईल रहली।

रसुल के गंगा जमुना संस्कृति के पैरवीकार भी कहल जा सकेला, बटवारा के बेरा, जाति धरम से ऊपर उठ के गीत लिखलन और गइलन भी….
“सर पर चढ़ल आजाद गगरिया
सम्भल के चल डगरिया ना
एक कुइया पर दुगो पनिहारिन,
एक ही लागल डोर हो
कोई खिंचे हिदुस्तान की ओरिया
कोई खिंचे पाकिस्तान की ओर
हिंदु ढूढे पुराण लेके, मुसलमान लेके कुरान
आपस मे दुनो मिल जुल लिहो
एके रख के ईमान…”

कलकत्ता में रसुल की भेंट जगडल के हलील मास्टर से भइल, हलील मास्टर उनका के मात्रा गड़ना सिखइलन, जौना से उ कविता के रचना करल शुरू कइलन। परम् पुजनीय गांधी जी के परभाव भारत के लोगन पर जादु खानी रहे, रसुल भी अपवाद ना रहलन।रसुल के गीत में एकर भाव दिखे…”छोड़ द जमीदारी…..”। में गांधी जी के स्वदेशी आंदोलन के झलक लउके। स्वतंत्रता के लड़ाई में भोजपुरीया लोगन के भी सक्रिय भूमिका रहे, आपन राजेन्द्र बाबु जीरादेई वाला…। रसुल के नाच बड़ी फेमस भइल

मशहूर संगीतकार “चित्रगुप्त” सवरेजी, मीरगंज,गोपालगंज(बिहार) के ही रहलन। चित्रगुप्त रसुल से मिललन औरि रसुल के नाटक के प्रशिद्ध कथा सब बम्बई ले गइलन जहवा एहि नाटक पर फ़िल्म बनल।

रसुल के “चंदा-कुदरत” नाटक पर 1976 में “लैला मजनु” हिंदी फिल्म बनल, रसुल के “वफादार हैवान का बच्चा उर्फ सेठ सेठानी” नाटक कथा पर इंसानियत फ़िल्म बनल और रसुल के “गंगा नहान”नाटक पर भोजपुरी के पहिला फ़िल्म “गंगा मइया तोहे पियरी चढ़इबो” 1961 में बनल।

ई सब फ़िल्म के संगीतकार चित्रगुप्त रहलन। लेकिन एकरा से रसुल के कौनो फायदा ना भइल

ई सब नाटक औरि गीतन के रक्षण ना भइला, कम भइला से कई गो धरोहर मौखिक परम्परा में गुजरत धीरे धीरे समाप्त भ गईल। रसुल मिया के जेतना भी गीत मिल बा, सब नाच मंच पर खेलल गईल गीत बा। रसुल चुकी आपन गीत साहित्य सृजन खातिर ना लिखलन,उ सब गीत नाच कथा के आगे बढ़ावे खातिर लिखलन। अगर रसुल मिया, आपन ई सब भोजपुरी के अमृत खानी रचना, साहित्य सृजन खातिर लिखले रहतन, त साहित्य में उनकर नाम स्वर्ण अक्षर में लिखल जाइत।

कौनो भी नजरिया औरि दृष्टिकोण से रसुल मियां, भिखारी ठाकुर , बाबु रघुबीर नारायण एवं महेंदर मिशीर से कम नइखन आकल जा सकत। रसुल मिया सम्भवतः भिखारी ठाकुर जी के संगे बिदेशिया में भी रहल बाड़न। बाद में उनकरा से अलग होके आपन अलग नाच बनवलन।रसुल मियां भोजपुरी के आन बान शान रहलन। इनकर रचना सब अमृतमयी बाटे।

रसुल मियां के लइका रहे कलुआ, जौन की रसुल मिया के नाच परम्परा के आगे बढवलस। लोग नाच देखे खातिर दुर दूर से जाव लोग। हमर बाबुजी भी देखले बानी, कलुआ के नाच। बड़ी महंगा रहे उ नाच। पंकज कुमार तिवारी जी के बड़का बाबुजी स्वर्गीय श्री हरेंद्र तिवारी निर्मोही के बियाह में 1001 रुपया में चौथारी बारात में 2 दिन खातिर कलुआ के नाच बन्हाइल रहे। बारात तिवारी मटिहनिया से अरेराज के बाबा के मंदिर के लगे राजेपुर गाँव मे गईल रहे। लोग 2 दिन कलुआ के नाच देखल लोग। कलुआ ढोलक बहुत बढ़िया बजावे। बाद में कलुआ बम्बई चल गईल और ओहिजन तबला वादन करे लागल।

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