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दिनेश पाण्डेय जी के लिखल भोजपुरी कविता

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दिनेश पाण्डेय जी
दिनेश पाण्डेय जी

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रजनीति

झूठ आँखि के सोझ जे, साँचा जवन अदीख।
अखनी के रजनीति में, दरसन के ई सीख।

वादा कइके छाड़ि दऽ, मान न नीति अनीति।
ना बैरी हित केहुओ, एखनि के रजनीति।

धोती खोलऽ तू हमर, अवरी हमूँ तहार
एही गोटी दुइजना, खेलीं जुगवासार

ठगवा के चेला चले, उहे पुरनकी चाल।
परि कंगन के लोभ में, पँड़या भइल हलाल।

मुकरनी

परले गोड़ हजार बे, पूरल जिय अरमान।
थरिया पलटसि पाइ के, सखि पिय ना जनमान।

बात करेजा के छुवल, दुनिया लागे बाध।
हित-मित मुदई करि गइल, पियवा ना सखि साध।

अपने चाभस सात रस, हम धाँसीं मँड़गील
कहईं के ना छोड़ले, सखि पिय ना ओकील।

अचरज

सुन मनभावन बतकही, जागल सूतल आस।
मन के होते ए सखी, फिर ना डलले घास।

सधले बाड़े मौन , सहि-सहि अत्त अन्हेर।
सिधवा के मुँह कुक्कुरो, चाटे आँखि तरेर।

जेहल चलले सरगना, चमचा भरल गरूर।
जामल ऊख पिछूत में, छँहिरा परल हजूर।

चोर धराइल सेन्ह पऽ, चरचा उड़ल घनेर।
अबकी बे थनदार के, सहजे हाथ बटेर।

जनकवि

अधपक दाढ़ी काँट अस, आँखिन कोरे कींच।
घँसि प्रतीक छलुआ सबद, कविता काढ़सि घींच।

बइठल ना पटरी कबो, तिय धिय पूत पतोह।
कूढ़मगज बुढ़ रचस, कविता में बिदरोह।

कानी तर सभके रखल, इनकर इहे अतीत।
आजु-काल्हु बइठार में, रचि रहुवे जनगीत।

नार

आजादी अहसास ह, जिनिगी के सहकार।
बबुआ तहरे कंठ में, केकर सुर जनमार।

जनबल तपबल ज्ञानबल कतिने श्रम बलिदान।
हीरऊ तब लवटल रहे जीवन के मुस्कान।

डाइन के दीदा लगल पसरल मायाजाल।
माँगत अलगा बेटवा, पीछे पाछु उछाल।

का का हिगराईं नुनू, ले दे साबुत देह।
धी मन आस बिसास सब भइले जरल परेह।

सबद बाहरी

सबद सँगोरल सुहित सुभ, जंतर-मंतर चीख।
मनजोती मोती मुकुर, भासे भने अदीख।

आँकत रहनीं सबद में रूप बिधाता केरि।
दइँता के मूरत कवन, चुपुके रहल उकेरि।

अब त आखर बनि रहल, आतंकी बंदूक।
सिरिजनहार लोहार से कहवाँ भइलस चूक?

कुछ अनचीन्हल बाहरी, सबद पसरले पाँव।
तबसे गाँव-गिराँव में, रोज गूह-गुहराँव।

दिनेश पाण्डेय,
पटना।

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