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दिल्ली में ‘रंगश्री’ के यात्रा (भाग -1, जेएनयू)

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दिल्ली में रंगश्री के यात्रा

रंगश्री: भारत के सबसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयन में से एगो बा दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय । वइसे त जेएनयू हमेशा से देश खातिर बहुत उर्वर भूमि रहल बिया। ई विश्वविद्यालय एक से बढ़के एक शिक्षाविद, भाषाविद, साहित्यकार, वैज्ञानिक ,नेता इत्यादि देत रहल बा। शायद इहे कारण रहे कि जब भोजपुरी रंगमंच के एगो पुरान संस्था रंगश्री के संस्थापक श्री महेंद्र प्रसाद सिंह जी 1993 मे दिल्ली अइनी त उन्हां के भोजपुरी रंगमंच के दिल्ली में स्थापित करे खातिर मने-मने जगह के खोज करे लगनी। एजा हम पाठकवर्ग के बता देल चाहब की ‘रंगश्री’ के स्थापना 1978 में बोकारो स्टील सिटी में भइल रहे।

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दिल्ली में रंगश्री के यात्रा
दिल्ली में रंगश्री के यात्रा

दिल्ली में संस्था के स्थापित करे के विचार से उचित जगह के तलाश जारी रहे। एहि बीच रंगश्री के एगो पूर्व कलाकार हाजीपुर निवासी सूरजदेव सिंह जेएनयू में एम.ए. के पढ़ाई करत रहलें। जब महेंद्र प्रसाद सिंह जी के उनका से मुलाकाभइल त शुरुआत जेएनयू से ही करे के प्लान बनल। पहिले त शुरू में जेएनयू कैंपस में रिहर्सल होखे आ दिल्ली के श्रीराम सेंटर, एलटीजी जइसन सभगार में नाटक के मंचन होखे। उर्दू के विद्यार्थी सूरज देव सिंह के पहल पर ही एगो नया टीम बनल रहे जेकर ज्यादातर सदस्य उर्दू के विद्यार्थी ही रहलें जइसे असफर फरीदी, सहजाद इब्राहीमी, फिरोज आलम, चाइनीज भाषा के हेम कुसुम , आ सोशल साइंस के विद्यार्थी डॉ कौशल किशोर सिंह इत्यादि। एकरा अलावे स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया के कुछ अधिकारी आ महेन्द्र प्रसाद सिंह जी के।घर के पांच गो सदस्य भी टीम में रहलें।

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जेएनयू में रिहर्सल होखत देख के धीरे-धीरे दोसर विद्यार्थी भी जुड़े लगलें आ एसएसएस सभागार में रंगश्री के पहिला मंचन 1994 में महेंद्र प्रसाद सिंह जी के लिखल-निर्देशित भोजपुरी नाटक “लुटकी बाबा के रामलीला” भइल। पहिला बार जेएनयू के विद्यार्थी लोग कैंपस में भोजपुरी नाटक के आनंद लेहल आ मंचन बहुत सफल रहल। ओकरा बाद तुरंत बिरजू के बियाह के मंचन शुरू हो गइल। 1995 में भी बिरजू के बियाह के कईगो सफल मंचन भइल

लगातार हो रहल मंचन से मंच स्तर पर ही ना बल्कि जेएनयू के आम विद्यार्थी जीवन में भी बदलाव आवे लागल रहे। अब से पहिले कैंपस में भोजपुरी के ओतना हल्ला ना रहत रहे आ लेकिन बोलचाल त रहले रहे बाकी नाटक के प्रभाव ई भइल की अब लोग खुल के भोजपुरी बोले-बतियावे लागल रहे। छात्र स्तर पर ही ना बल्कि प्रोफेसर लोग भी एह परिवर्तन पर आपन सहमति जता चुकल रहे। मैनेजर पांडेय त रंगश्री के बहुत बड़ा प्रशंसक रहनी। समय के साथ साथ सब कुछ अपना गति से आगे बढ़त गइल।

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वर्ष 2000 में जेएनयू के ट्रिपल एस सभागार में ‘बिरजू के बियाह’ के 55वां प्रस्तुति भइल जवना के रिपोर्ट विस्तार से दिल्ली के कईगो पत्र-पत्रिकन में छपल जवना में से हिंदुस्तान के रिपोर्ट सूरजदेव सिंह के फोटो के साथ छपल रहे। कुछ साल सूरजदेव सिंह जवन कबो युवा राजद के नेता भी रहल रहलें अब पीएचडी करके डॉक्टर हो गइलें। रंगश्री के कारवां में से पुराना विद्यार्थी लो जीवन में कामयाब होके आगे बढ़त गइल लो आ नाया विद्यार्थी लोग जुड़त चल गइल। एहि तरह से जेएनयू रंगश्री खातिर एगो उपजा जमीन के रूप में काम आईल।

अगिला भाग के इंतजार करीं , जल्दिये आयी…..

– लवकान्त जी

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