दीपक तिवारी जी के लिखल कुछ कविता

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आपन बाप माई

घर में छोडी के नवकी दुलहिन आपन बाप माई,
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

इहे सोच के पोषल लो का तनी हमके बतला दी,
गलती जदि कहतानी त हामारा के झुँठला दी।
लाठी बानी बुढ़वती के रउवा बनी जनि कसाई…
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

का बीतत होई ओलो प हम कइसे करि बयान,
आ रहन राउर देख के बडी़ हमहुँ बानी परेशान।
विदा करत में रउवा के आवेला बड़ा रोवाई…
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

रउवा बिना कटी ना रतिया गुजरी नाही दिन,
दीपक तिवारी मन के हामारा कई दिहनि खीन।
मान जाई करि विनती बा ए जी एहि में भलाई…
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

ना दरद तनिको बुझेनी रउवा हामारा पीड़ा के,
इलाज कराई आपन भीतरी ढुकल किरा के।
एको कवर खाइल जाई ना पानीयो घोटाई…
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

भइनी जाए के तइयार हम रोकब नाही रउवा के,
राहँ देखब तबे जब उच्चरल सुनब कउवा के।
बिना रउवा अकेल हमसे ना पलो भर रहाई…
काँहे रउवा बाहरा जानि केतना करेनी कमाई।

जय शिव शंकर

बसहा बैलवा के शिव क के सवारी,
तिहुँ लोक भ्रमण भोला करेले त्रिपुरारि।

औघड़ दानी हउँए सभका से उ निराला,
जटा में गंगा मइया गरवा में सर्प माला।
कष्ट मिटावे सभकर हउँए उ पापsहारी…
तिहुँ लोक भ्रमण भोला करेले त्रिपुरारी।

क्षण में बना उ देले क्षण में बिगाड़ देले,
खुश होले जब भोला सभ कुछ भर देले।
धन दौलत सुख शांति देले घरs अटारी…
तिहुँ लोक भ्रमण भोला करेले त्रिपुरारी।

कुपित होले जब उ खोलेले तीसरा अखियाँ,
काँपे लागेला सभे केहूँ नाही पारे झकियाँ।
मातल रहेले खाके भांग त्रिशूलsधारी…
तिहुँ लोक भ्रमण भोला करेले त्रिपुरारी।

प्रभु के भजन

प्रभु के निश दिन भजन कइल करअ हो,
सुबह शाम उनुकर धेयान धइल करअ हो।

उनुकर जाप करअ कुछो नइखे जीवन में,
उन्ही के चलती चले तिहुँ लोक भुवन में।
चरण में माथा आपन उनुका तू धरअ हो…
सुबह शाम उनुकर धेयान धइल करअ हो।

खाली हाथ आइल बाड खालिए तू जइब हो,
करब तू जइसन करम ओइसन पइबs हो।
हो जा विलीन अबो देर नाही करअ हो …
सुबह शाम उनुकर धेयान धइल करअ हो।

मन अपन साफ करs तू पइब सच्चाई के,
उ अइहे जरूर उनूके देखs तू बोलाई के।
होई मिलन मन थोर जनि करअ हो…
सुबह शाम उनुकर धेयान धइल करअ हो।

चुप रहल समझदारी हँ।
घर परिवार सम्भारल बड़,
बुजुर्गन के जिम्मेवारी हँ।

केतना कठिन होला सभके,
साथ में लेके चलला में।
सभे फरज निभावत होई,
केतना माजा बा झेलला में।

छोट बड़ घर के मुखिया,
आगे मालिक होले एके।
दरद दुःख जे सभ सहेला,
मालूम होई सेके।

आगे बढ़ के पीछे ना हटी
रहि हरदम ललकारत।
दीपक इहे करेले विनती,
रउवा दीया रही बारत।

तइयार बा लोग टँगरी खिंचे के,
मनोबल गिरावे के।
हमारा आगे के बाटे,
बड़ा जल्दी बा देखावे के।

हार के कबो रुकल ना जाला,
रहि टाइट झुकल ना जाला।
केहू कुछो बिगाड़ी नाही,
बारहो मास भूखल ना जाला।

कहाँ बा गलती पकड़ी ओके,
पंजा में अब जकड़ी ओके।
जवन भइल सभ तवन भुला के,
अब रात दिन ना अखडी ओके।

भोजपुरी

नीक नीमन माई भाखा,
हामार हँ भोजपुरी।
पुरुखन के दिहल ,
ई थाती हँ भोजपुरी।

दीप हमेशा जरत रहो,
धूमिल कबो ना होखे।
राखब एके सहेज के,
हामार जान हँ भोजपुरी।

रहे देला ना भेद भाव,
भाषा अइसन हँ भोजपुरी।
शान बान संस्कृति हामार,
पहचान हँ भोजपुरी।

दुःख विसरे शांति मिले मन के,
सुन के भाषा भोजपुरी।
डेग डेग प जीवन में बा,
बानी अभिलाषा भोजपुरी।

डरे केहू का डरे नाही
जान बूझ के दरे नाही
भाव से शीश झुकावेला
अइसन हँ भोजपुरी

सभके गले लगावेला,
प्रेम के पाठ पढावेला।
कबहु नाही भुलावेला,
अइसन का हँ भोजपुरी।

सभ आपन हँ गैर केहू ना,
मिली जुली सभसे रहे के।
रगड़ा झगड़ा आपस में,
कहे रहे ना भोजपुरी।

एह माटी के गाथा इयाद,
सभका मुँह जबानी बा।
वीर कुँवर के नाता उनुकर,
एही से कहानी बा।

वीर सपुतन के माटी,
जानली हउए भोजपुरी।
मिठास मिलेला बोली में
उहे हँ भाषा भोजपुरी।

मधु नीयन मीठ भाषा हामार,
खोजलो प जग में ना मिली।
लूर सहुर सिखावे ढंग,
प्रेम के प्रतीक हँ भोजपुरी।

दीपक तिवारी
श्रीकरपुर, सिवान।

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