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बिहार के भोजपुरी लोककला : दयाशंकर उपाध्याय

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बिहार के भोजपुरी लोककला : दयाशंकर उपाध्याय

आदमी के अनुभूतियन के अभिव्यक्ति के नाँव लोककला ह। लोककला में सौंदर्य के साथे आनन्दो के समावेश होला । वास्तव में ई आदमी के प्राण-शक्ति ह । आनन्दबोध के भाव रंजित बाह्य रूप ह। विहार (प्रान्त ) में लोककला के दृष्टि से मुख्य रूप से तीन गो प्रधान अंचल वाड़े स-मिथिलांचल, भोजपुरी अंचल आ छोटानागपुर के जंगली अंचल ।

भोजपुरी लोकसाहित्य आ लोक कला के विस्तार आ प्रभाव बहुत बड़हन क्षेत्र प परेला । भोजपुरी अंचल के लोककलाकार लोग साँच कहल जाय त गोस्वामी तुलसीदास के शब्दन में ‘स्वान्तः सुखाय” अपना कला के रचना करत रहल बा। एह से ओह लोग के कलाकृतियन में अस्वाभाविक तत्वन आ बनावटी विधानन के प्रभाव ना लउके । एक तरह से ई कला एह सभ बन्हनन से मुक्त लउकेले।

सही माने में विहार के भोजपुरी अंचल पुरनका शाहाबाद जिला, चम्पारण जिला, आ सारने जिला मानल जाला। अइसे भोजपुरी क्षेत्र के सर्वेक्षण कइला प अनेक प्रकार के लोककला देखे के मिलेला। जवन एह तरे वा-

(१) भित्तिचित्र आ अल्पना
(२) थापा
(३) गोदना
(४) मेंहदी
(५) महावर
(६) अलंकार भा गहना बनावल
(७) कसीदाकारी

भित्तिचित्र आ अल्पना :

सम कला में चित्रकला प्रधान मानल गइल बा । आदि मानव काल से एह कला के विकाभइल बा। एह से चित्रकला कला के प्रधान अंग बन गइल । ‘वात्स्यायन’, ‘कामसूत्र’ में ६४ कलन में चित्रकला के एगो महत्त्वपूर्ण कला मनले बाड़न । प्रो० राधाकमल मुखर्जी चित्रकला के आदमी के किसिम-किसिम के भावना, आशा, निराशा के प्रगट करे के एगो माध्यम मनले बाड़े ।

बिहार के भोजपुरी लोककला : दयाशंकर उपाध्याय
बिहार के भोजपुरी लोककला : दयाशंकर उपाध्याय

भोजपुरियो क्षेत्रन में लोक कलाकार लोग चित्रकला के अपना मन के भाव दरसावे के एगो माध्यम मानल । मिथिलांचल में “कोहबर” में किसिम-किसिम के चित्र बनावे के रेवाज सदिधन से चलल आ रहल बा। भोजपुरियो क्षेत्र में ‘कोहबर” बनावे के रेवाज बा। सही माने में कोहबर के देवाल प चित्र बनावे के रेवाज के पाछा इहे रहस्य रहल होई कि दुलहिन आ दुलहा के पहिला मिलन मधुमय होय, सुखमय होय आ ओह लोग में आत्मिक भाव जागे। एही भावना से मिलल भित्ति-चित्र प अनेक चित्र बनावल जाला। चित्रन के विपयो मुख्य रूप से आध्यात्मिक आ प्रेमात्मक होला । चिरई, पशु के युगल-जोडी आ आलिंगन शिव-पार्वती, गणेश-लक्ष्मी आदि के दृश्य बनावल जाला, जेह से एह चित्रण के देखि के नया जोड़ी के हिरदया में प्रेम-भाव अंकुरे, ओह लोग में एक दोसरा के प्रति नैसगिक आनन्द लेवे के अभिलाषा जागे। कोहबर बनावे के सिरिफ इहे एगो उद्देश्य रहल । कोहबर में गणेश, शिव-पार्वती आदि देवी-देवता के चित्र मगलमय जीवन के प्रतीक मानल गइल बा । पशु, पंछी, लता-फूल आदि के चित्र जोड़ी में प्रकृति के प्रति अनुराग के भावना जगावेला। कोहबर के चित्रन में मुख्य रूप से लाल उज्जर रंग के प्रयोग कइल जाला । मिथिलांचल में अनेक रंगन के मिलावट कोहबर के चित्रन में लउकेला। कोहबर के देवाल पहिले गोबर (लेप) से लीप दिआला । ओकरा बाद गेरू घोर के लाल रंग बनावल जाला आ उज्जर रंग खातिर चाउर के पिसान काम में लावल जाला । हाथ के अगुरी से एही रंगन के मदद से अनेक चित्र बनावल जाला। मिथिला के कोहवर के चित्रन में बहुते बारीकी, चित्रात्मक मौष्ठव आ रंगन के मिलावट लउकोला, बाकिर भोजपुरी क्षेत्र के कोहबर के चित्रन में सूक्ष्मता ना लउके ।

इहे ना, पिड़ियो के वेरा चित्र बनावे के रेवाज बा। कातिक, अगहन में कुआर लइकी पिड़िया व्रत करेली स। गोबर के छोट-छोट पिण्ड के गोल बना के देवाल प चपका दिआला । ई वर्गाकार रूप में चपकावल जाला। एकरे साथ देवाल प अनेक आउरो चित्रो वनावल जाला जे एह परब से संबंधित होला ।

अल्पना :

भोजपरी क्षेत्र में मांगलिक अवसर प अल्पना बनावे के रेवाज बा । अइसे त सउसे उत्तर भारत के गवई अचल में अल्पना बनावे के कवनो ना कवनो रूप में रेवाज बड़ले बा। बंगाल में अल्पना बनावे के रेवाज बहुते पुरान बा। भोजपुरी क्षेत्र में अल्पना बनावे के चउका पूरल” कहल जाला। बिआह में दुआर-पूजा खातिर अनेक तरह के आकृति बनावल जाला । पूजो के वेरा वेदी लगे आकृति बनावल जाला । नया-नोहर दुलहिन के घर में डेगो डाले के वेरा सीढ़ी भा ओसारा में अल्पना बनावल जाला । ई सभ आकृति मुख्य रूप से ज्यामितिक ढंग के होलो स। गोल, त्रिभुजाकार, वर्गाकार आकृति अधिका लउकेला ।

सूखल आंटा के जमीन प चुटुकी से गिरा-गिरा के अनेक आकार बनावल जाला। बिआह के बेरा जहाँ कलसा धइल जाला ओकरा अगल-बगल भा कलसा १ अनेक आकृति बनावे के रेवाज बा । पूजा के बेरा काठ के तखती प गनगौरी भा दोसर देवता के आसन देवे से पहिले पीढ़ा के अल्पना से सजावल जाला। ई आकृति धामिक दृष्टि से शुभ मानल जाला। अइसे त भारतीय संस्कृति में खास क के लोकजीवन म सभ तरह के चित्र बनावे के एकमात्र उद्देश्य जीवन के सुखमये बनावल बा। मांगलिक अवसर मंगल मय तरीका मे बीते आ बिमाह के रसम में कवनो बिघिन ना आवे, एही सभ बातन के ध्यान में राखि के कोहबर में चित्रांकन भा अल्पना बनावल जाला ।

थापा :

भोजपुरी क्षेत्र में हाथ के अंगुरी से जे किसिम-किसिम के चित्र बनावल जाला ओकरे के थापा कहल जाला। बिआह के मंडप में लागेवाला बास प पहिले थापा लिहल जाला जवना के शुभ मानल जाला । शीतला मइया के पूजा रामनवमी के पहिले रात में कइल जाला, ओहू परब में मेहरारू अपना हाथ के थापा देवालपदेलो स जवन कई पंक्तियन में होला । ओकरे नीचे कलसा धराला । इहे ना, कलसो प हाथ के अंगुरी के निसान बनावल जाला। औटा घोर के, ओकरा में हरदी मिला दिआला । एही से थापा लग:वल जाला। कहीं-कहीं सेनूर के टीटो लगा दिला जवना के ‘टीकल’ कहल जाला । भोजपुरी लोकगीतन में थापा लगावे के विवरण कहीं-कहीं मिलेला।

गोदना :

आदमी में शुरूए से अलंकरण के भावना रहल बा। गवई अंचल में मेहरारू ओ मरद अपना देह प खास क के हाथ, गोड़ आ गाल प गोदना गोदवावत रहे जे आजो कवनो ना कवनो रूप में प्रचलित बा। भोजपुरी क्षेत्र में मेहरारू गोदना गोदवावे के जादे सवखिन होली स । भोजपुरी अंचल में गोदना गोदेवाली के टेटुइन कहल जाला आ कहीं-कहीं गोदनहरी कहल जाला। भोजपुरी साहित्य में एकर विशेष विवरण मिलेला। एगो लोकगीत में गोदना के बारे में एह भाव के जाहिर कइल गइल बा कि जइसे रंगरेज चुनरी चटक रंग में रांगेला त ओकर मुघरई बढ़ जाला ओसही ए गोदनहरी! अइसन गोवना गोद द कि हाथ के सुघरई दोगिना बढ़ जाय ।

धतूर के दूध में काजर मिला के करिया रंग तइयार कइल जाला आ सूई के रंग में उवा के अंग में गड़ा-गड़ा के किसिम-किसिम के आकृति बनावल जाला। एह आकृतियन में शिव-पार्वती, राम-सीता, हनुमान आदि देवी-देवतन के आकृति रहेला । फूल-पत्तो बनावल जाला। कुछ गांवन मे मेहरारू अपना हाथ में अपना मरद के नाँवों गोदवावेली स। हमनी किहाँ ई रेवाज बा कि मेहरारू अपना मरद के नांव ना ले सके, एह से कहू मरद के नांव पूछ दिहल भा अइसन मोका आ गइल फि मरद के नांव बतावल जरूरी हो गइल त ओइसना हालत में मेहरारू अपना बांह में गोदल मरद के नाँव देखा देली स । एह तरह से मरद के नांव जानल जा सकेला ।

एकरा पाछा दोसर भावना इहो बा कि मेहरारू के मरला प जरतो खानी ओकरा मरद के इयाद ओकरा संगे बनल रहे। जो पहिले मरद के म अत हो गइल होखे त एह गोदना के महातम आउरो बढ़ जाला। एह से एह गोदना के धार्मिक आ सांस्कृतिक दूनो महातम बा। लोककला के मर्मज्ञ डॉ० कृष्णदेव उपाध्याय जी एकरा के एगो लोककला मनले बानी।

मेंहदी :

लोकसाहित्य में मेंहदी के अलंकरण के रूप में बहुते महातम दिहल गइल बा। सावन में मेहरारू हाथ में मेंहदी लगावेली स । अइसे त मेंहदी के कलात्मक रूप राजस्थान में देखे के मिलेला बाकिर भोजपुरियो अंचल के मेहरारू मेंहदी लगा के खुश होली स । मेंहदी पीस के ओकरा में करुआ तेल मिला के हाथ में लगावल जाला। एकरा से मेंहदी के रंग माऊर चटकार हो जाला। मेंहदी सींक से हाथ में एह तरह से लगावल जाला कि अनेक प्रकार के ज्यामितिक आकार भा फूल-पत्ता बन जाय । उर्दू के एगो शायर ठीके कहले बाड़े-
‘रंग लाती है हिना, पत्थर पर घिस जाने के बाद ।”

भोजपुरियो साहित्य में मेंहदी के जहाँ-तहाँ जिकिर भइल बा ।

एगो लोकगीत में ई जिकिर बा कि ननद अपना भउजाई के मेंहदी लगावतिया आ भउजाई हाथ में मेंहदी देख के खुश हो तिया। एगो दोसर लोकगीत में ई स्पष्ट

1. ननदी लगावेली मेंहदी भउजी के हथवा में मेंहदी के रंगवा टेस ……।
2. गोरे गोरे हाथो में मेंहदी लगा के गीरी चलली ससुरिया हो ना ….।।

कइल जा रहल बा कि गोर कनेया अपना हाथ में मेंहदी लगा के ससुरा जा रहल बिया जहाँ ओकर मरद ओकर हाथ देख के खुश होई ।

महावर :

महाबर के रेवाज लोकक्षेत्रन में बहुत पुरान बा। उत्सव, परब भा तेवहार में गोड़ के अलंकृत करे खातिर महावर के प्रयोग कइल जात रहे आ आजो गवई कनेया एकर प्रयोग करेली म। कहीं-कहीं एकरा के “अलतो लगावल” कहल जाला। लाल रंग से गोड़ के चारु ओरे रांगल जाला आ गोड़ प थोर-बहुत आकृतियो बना दिहल जाला । कविवर रत्नाकरो महावर के बारे में लिखले बाड़न :

पाइ महावर देन को नाहनि वैठी जाय,
फिरि-फिरि जानि महावरी एड़ी भीजति जाय ।

भोजपुरियो लोकसाहित्य में महावर के वरनन जहाँ-तहाँ देखे के मिलेला। एगो लोकगीता में एगो मेहरारू के सुघरई के वरनन करत कइल गइल बा कि एगो सांवर मेहरारू अपना गोड़ में महावर लगा के, बिंदी लगा के, लिलार प जड़ां टिकुली साट के मने-मने अपना के बहुते सुघर वूझ रहल बिया। एही तरे महावर के आउरो अनेकन प्रसंग लोक गीतन’ में मिलेला ।

अलंकार बनावल :

गवई अंवल में मेहरारून के गहना से अविका लगाव देखे के मिला। गांव के सोनार किसिम-किसिम के गहना बनावेला। ई शिल्प कलात्मक प्रकृति के होला। सोना, चानी, तामा आदि धातुअन से गहना बनेला। घर में सभे अपना औकात के मोताबिक सोना-चानी के जेवर पहिरेला । भोजपुरी अंचल में मेहरारू जे  गहना पहिरेली स ओकरो किसिम-किसम के आकृति बनल रहेला । ई मुख्य रूप से फूल-पत्ता मा कबो-कवो दोसरो आकृति रहेला। इहे ना भोजपुरी लोकगीतो’ में गहना के बरनन पाइल बा । एगो गीत में कड़ा, हसुनी, के बरनन आइल बा। एगो दोमरा लोकगीत’ में राम आ सीता के हाथ में अगूठी आ गरदन के हार के बरनन आइल बा। एगो दोसरा लोकगीत में हार, पछुआ के वरनन आइल वा जवन गवई मेहरारू अक्सर पहिरेली स-

“हरवा १ अड़बड़ लिखि द
पछुआ पर गड़बड लिखि द
अँचरा पर लिखी द हरि के नउआ ए भइया…।”

एगो दोसरा लोकगीत में गोड़ में बिछिया आ माँय प टिकुली के बरनन आइल बा जवना से देह सज रहल बा-

गोड़वा महावर पावर विछिया, लिलरा जड़ाव के टिकुलिया रे सांवरिया…।

एगो दोसरा लोकगीत’ में कुछ गहनन के नांव आइल बा आ एह बात के बरनन बा कि एह गहनन से सुघरइ दोगिना हो जाला-
बाबू का डाड़े करधनिया,
देखत नीक लागेला,
औ पांव में बाजेला पैजनिया,
अजब छवि छाजेला…।’

एह से भोजपुरी लोकगीतन के सूक्ष्म विवेचन कइल जाय त स्पष्ट हो जाई कि गवई मेहरारू अनेक तरह के गहना पहिरेली स जवना में से कुछ एह तरे बा-मगलटीका, नथिया, हंसुली, कंठा, हलका, तिलरी, सविया, कंगना, कड़ा-छाड़ा आदि । एगो गीत’ में त बहुते विस्तार से अनेकन गहना के परिचय दिहल गइल बा जवना के पेन्ह के गांव के गोरी मने-मने हरखित हो रहल विया।

“करि के सिंगार गोरी चले अरमनवा से,
गरबा में हरवा लगावेले झरेलिया
पोर-पोर अंगुरी में पेन्हेले मुदरिया,
कनवा में बलिया झुलावे रे झरेलिया
सारी का समीर पेन्ही, चोली बूटदार पेन्ही,
लिलरा में बुदा करि लेली रे झरेलिया
कमर में सोमे तोरा बाकी करधनिया से,
दतवा में मिसिया लगावेले झरेलिया ।।

एह से भोजपुरी क्षेत्र में गहनन के रूप एगो शिल्प के रूप में कलात्मक ढंग से विकसित कइल गइल ।

कसीदाकारी :

कसीदाकारी एगो बहुते पुरान लोककला ह। पुरान संस्कृतो ग्रंथन में एकर जिकिर भइल बा। वाजसनेयी संहिता आ ऐतरेय ब्राह्मण में “पेशस” शब्द आइल बो जेकर मतलब कसीदाकारी है।

हर्षचरित’ में “पुष्पपट्ट” शब्द आइल बा जवना के फूल से बनल कसीदाकारी के कपड़ा मानल गइल बा। बिहार के लोकक्षेत्र में कसीदा खातिर गंवई मेहरारून में जादे रूचि बा। अइसे कसीदा के काम के तीन वर्गन में बाँटल गइल बा-फूल बनावल आने कसीदा के काम, एप्लीक के काम आ सूजनी के काम । मिथिलांचल में तीनो काम बहुते पटना के साथ नीमन ढंग से मेहरारू वनावेली स। वाकिर भोजपुरी क्षेत्र में कसीदा आ सूजनी के काम जादे होला। भोजपुरी क्षेत्र में खास क के जब लइकी के बिआह होला त गवना में लइकी कीहाँ से कपड़ा, मिठाई आदि लइका की हाँ जाला जवना के “झापी” कहल जाला। एह झाँपी में कसीदा कइल कुरती, चुनरी, साड़ी आदि लइकी के सास, ननद खातिर कनेया के नइहर से भेजल जाला। एह में कसीदो के काकिसिम-किसिम के होला । मिथिलांचल में मुख्य रूप से ई तीन तरह से बनावल जाला-घेचुआ किसिम, भरीत किसिम आ तगनुआ किसिम के कसीदा के काम । भोजपुरी क्षेत्र में भरीत किसिम के कसीदा अधिका प्रचलित बा जवना के भरउआ कसीदा कहल जाला। एह में कई तरह के आकृति बनावल जाला। भोजपुरी क्षेत्र में एक तरह के कसीदा के “बभनवटा” कसीदा कहल जाला। एह तरह के कसीदा मुख्य रूप से ब्राह्मण भा भूमि रूप से व्राह्मग भा भूमिहारे ब्राह्मण के मेहरारू बनावेली स, एही से एकरा के “बभनबूटा” कहल गइल बा। एही तरह से आउरो किसिम के कसीदा बनावल जाला जवना के अनेक नांव वा । इहे ना, भोजपुरी लोकगीतो में कसीदा के बरनन मिलेला। एगो भोजपुरी लोकगीत में कामदार पमरी आ चोली के जिकिर आइल बा।

दुल्हिन के सोमे कामदार चोलिया ।

एगो दोसर लोकगीत में सूई से फूल बनावे, लहंगा में धागा से फेंड बनावे के बात कहल गइल बा।

इहे ना, लोकगीत में कसीदा में काम आवेवाला रंगों के जिकिर भइल बा। एगो गीत में बैगनी, हरिअर रंग के बरनन कसीदा वनावे के क्रम में आइल बा । भोजपुरी क्षेत्र में सुनियो बनावे के कला प्रचलित बा। फाटल-पुरान कपड़ा मिला के ओह प रंगीन धागा से कई तरह के आकृति बनावल जाला जवन गवई अंचल में गद्दा के काम करेला। मैथिली क्षेत्र में सूजनी प बनल आकृति (तरह-तरह के रंगोन धागा से) बहते सुघर होला। बाकिर भोजपुरी क्षेत्र के सूजनी में मोंटा रूप से रंगीन धागा के मदद से कुछ आकार बना दिला जे में सादा ना रहे ।

एह से भोजपुरी क्षेत्र में कसोदा के काम बहुते बड़ा पैमाना प होला जवमा में कलात्मकतो के समावेश होला।

एह तरह से जो भोजपुरी लोक कला के सूक्ष्म रूप से परीक्षण कइल जाय तई स्पष्ट हो जाई कि एह लोककला में जिनिगी के अनेक जरूरतन से “अनुकूलता भा संगति” पावे के एगो खास प्रवृत्ति लऊकेला। एह से भोजपुरी लोककला सहो माने में ”स्वान्तःसुखाय” मानल गइम जवना में आदमी के आनन्द आ जिनिगी के सुखे के कामना कइल गइल बा। ई सुख सांसारिक भइली प नैसर्गिक होखे, सुरुचिप्रधान होय, एह प लोककलाकारन के हरदम ध्यान बनल रहल ।

धयान दीं : इ आलेख भोजपुरी अकादमी पत्रिका से लीहल गइल बा

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