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भोजपुरी में श्लीलता आ अश्लीलता : डॉ. जयकान्त सिंह

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जयकान्त सिंह जी
जयकान्त सिंह जी

परनाम ! स्वागत बा राउर जोगीरा डॉट कॉम प, रउवा सब के सोझा बा जयकान्त सिंह जी के लिखल आलेख भोजपुरी में श्लीलता आ अश्लीलता, पढ़ीं आ आपन राय दीं कि रउवा जयकान्त सिंह जी के लिखल इ आलेख कइसन लागल आ रउवा सब से निहोरा बा कि शेयर जरूर करी।

भोजपुरी जगत के नवही जमात में श्लीलता आ अश्लीलता के लेके बहस जारी बा । ई देख-पढ़-सुन के मनसायन लाग्अता। अबतक अश्लील गीत गा चुकल गायक-गायिका लोग जब समाज आ सरकार से आज अश्लीलता के खिलाफ कार्रवाई करेके माँङ् करता त एगो दल गाभी मार् अता -‘नव सव चुहा खाके बिलरी चलली हज करे।’ दोसर दल ओह लोग के बचाव करत गनिका, रतनाकर आ अँगुलीमाल डाकू के परतोख देके सुधरत छवि के सराहत नजर आव्अता। इहो बिचार बेजाँय नइखे कहल जा सकत। हमरा बिचार से जिनगी जीये के दरमेयान समय, समाज, संदर्भ आ अस्थान के मोताबिक श्लील अश्लील आ अश्लील श्लील के रूप ले लेवेला। अइसे मर्यादा के आदर्श आवरन आदमी के आउर जीया जन्त से अलग करेला। एके गो चीज खने करिखा खा काजर।

‘विकल जी’ के एगो मुक्तक बा –

हवा के झोंका पर सागर में लहर जागेला,
बसंत के भोर बिरहिन का जहर लागेला।
काजर आ महावर दूनो ठीक लागे ठौर पर,
रूप बिगाड़ देला जब ई कुठहर लागेला।।

पिछिलका दसईं में दवाई लेवे दोकानी गइल रहीं। पंडाल पर बन्हाई हरन से पवन सिंह के गावल भोजपुरी के फूहर गीत बाजल बन भइल आ उनकरे गावल भोजपुरी देवी गीत बाजे लागल। दोकानदार कहलें- ‘ देखीं सर, तब से ई भोजपुरी बजा बजाके नाक में दम कइले रल्अ अब जाके भजन लगवलस।’ हमरा हँसी बर गयल। मने मने गुना भाग होखे लागल कि दूनो गीत भोजपुरिये के ह आ लोग फुहर के भोजपुरी बुझ्अता आ नीमन के भोजपुरी ना कहके भजन कह्अता। बगल में ठार एगो मैथिली भाई से ना अराइल। जवन कुछ कहलें, ओकर भाव रहे जे भोजपुरी बहुते फुहर आ निर्लज्ज भासा ह। ई सउँसे उत्तर भारत में इहे कुल्ह गा गाके कचवाहिन कइले बा। हम नवर भाव से बात सझुरावे का लेहाज से हस्तक्षेप करत कहलीं -‘ भाई कवनो भासा फुहर-बेलज्ज ना होखे। ओकरा में लिखे-रचे वाला मनई के सोच-बिचार आ नासमझी फुहर-बेलज्ज भा अश्लील हो सक्अता।

भोजपुरी इहे ना ह बाकिर इहो ह।रउरा कह सकेनी। ‘ कहलें- ना जी, रउरा जे कहीं, जदि अइसन ना रहित त हमरा मैथिली में अइसन फुहर-निर्लज्ज गीत आ कवनो मेहरारु का अंग-प्रत्यंग के उघार बरनाका काहे नइखे?’ फेर हम बोललीं-‘ भाईजी, रउरो किहाँ बा। बाकिर राउर भासा मीठ-मोलायम होखे का संङे्-संङे् एतना छोट जगह में सिमटल आ गैर मैथिली भासी खातिर अनबुझ बा कि सुनियो के समुझ ना पावे। मधुबनी, सीतामढ़ी आ दरभंगा बरियात करे कय बेर जाये के हमरो मोका मिलल बा।उहाँ का आर्केस्ट्रा में मैथिली के लोकगीतो सुनके मोका मिलल बा। हमरा गाँव के कई गो भउजाई लोग मिथिले ओर के बा। ओहू लोग का मुँहे उहँवा के गीत सुनले बानी।अइसन मत कहीं जे मैथिली में ओइसन गीत नइखे। आउर छोड़ीं, हमार बहुते प्रिये कवि हउवें विद्यापति ठाकुर जी। जिनकर श्रृगांर आ भक्ति रस वाला पद सब के कवनो भासा में जोर ना मिले। उनका पद में सैसव आ वयस अवस्था का बीच के बाला-जुवती-जनानी का अंग-प्रत्यंग जे बरनाका बा जाके रउरा पढ़ीं आ ना पढ़ले होखीं त उदारण खातिर दू चार गो बानगी सुनीं। आउर अंग-प्रत्यंग के छोड़ीं, उहाँ के पद में बाला-जुवती का पयोधर यानि कुच ,उरोज , अस्तन भा छाती के जतना रसाह बखान बा, ओइसनसाइते कवनो भासा में मिली।

भोजपुरी में ‘कुच’ का ‘कु’ के जगे ‘चु’ हो जाला। बानगी देखीं –
विद्यापति ठाकुर जी अपना रचनन में खुद के अवहट्ठ भासा के कवि बतवले बारन।। बाकिर उनकर रचना मैथिली, संस्कृत, बंगला आ उड़िओ भासा में पावल जाला। राजा कीर्ति सिंह आ शिव सिंह के दरबारी पंडित आ कवि रहलें। कीर्तिलता, कीर्तिपताका, भू-परिक्रमा, पुरुष-परीक्षा,लिखनावली, शैव-सर्वस्व-सार, गंगा वाक्यावलि, दान वाक्यावलि, दुर्गाभक्ति तरंगिणी, आदि के रचना करेवाला विद्यापति ठाकुर के ‘अभिनव जयदेव, कविशेखर जइसन उपाधि मिलल रहे। कई देवी-देवता से जुड़ल रचना कइलें, बाकिर मूल रूप से शैव मत के मानेवाला रहलें।

जहाँ तक उनका रचल पदन के सवाल बा त मूल रूप से श्रृंगार रस के कवि रहलें आ उनका श्रृंगार के आराध्य देवी-देवता राधा-कृष्ण रहलें। अइसे अपना पद सब में राजा शिव सिंह आ रानी लिखिमा देवी के नारायन आ रमा (लक्ष्मी) भा कृष्ण आ राधा मान के ओह लोग के श्रृंगारिक नख शिख, केलि-क्रीड़ा आ रति विलास के बहुते रसाह बरनन कइले बारन। आज जवन भोजपुरी लोकगीतन का अश्लीलता के लेके मैथिली, भोजपुरी सहित आउर भासा-भासी सवाल खड़ा कर रहल बारन। स्वाभाविक बा। अश्लीलता के खिलाफ आवाज उठे के चाहीं। बाकिर ई समस्या हर बोली-भासा का संङे जुड़ल बा। चुकि भोजपुरी एह देस के बहुते बड़ भूभाग सहज-सरस भासा ह, जवना वजह से हर भासा-भासी तक एकर अर्थ-भाव सहजे संप्रेषित हो जाला। आउर भासा का संङे ई सुविधा नइखे। विद्यापति ठाकुर के मैथिली पद सब में बखानल खाली कुच भा उरज भा अस्तन भा छाती भर के रसाह बरनन के कुछ नमुना भा बानगी देख के अपना सुझ-समझ के हिसाब से श्लीलता आ अश्लीलता तय करीं सभे।

विद्यापति जी बाला जुवती के सैसव से जौवन में जात समय होत देह के बिकास-बदलाव के बरनन करत लिखल बारन कि ई अवस्था आवत आवत थीर नयन कुछ अथिर (चंचल) होखे लागल आ कुच मतलब उरज उभर वाला जगह पर ललाई लउकल।(थीर नयन अथिर किछु भेल, उरज उदय-थल लालिम भेल)। जोड़ा कुच के अंकुर के उतपति भइल(कुच जुग अंकुर उतपति भेल)। तब पहिल कुच बइर फेर नारंगी(संतरा) के आकार लिहलस आ दिने दिन काम के पीड़ा बढ़े लागल । ई कुच बीजपुर के बड़का नींबू तेकरा बाद बढ़के सिरिफल को जोर के हो गइल।

(पहिले बदरि कुच पुन नवरंग, दिन-दिन बाढ़ए पिड़ए अनंग। से पुन भए गेल बीजकपोर,अब कुच बाढ़ल सिरिफल जोर)। ढ़ोंरी के छेद से ऊपर के ओर रेघारी जइसन जामल रोंआँ पिआसल नागिन अस रस लेवे आगे बढ़्अ बिआ बाकिर जुवती के नुकीला नाक रूपी पक्षीराज गरूड़ के भय से दूनो कुच रूपी परबत के बीचे छूप जात बिआ। (नाभि-बिबर सएँ लोम लतावलि, भुजग निसास-पिआसा। नासा खगपति-चंचु भरम भयें, कुच-गिरि-संधि निबासा।।) नहात आ मुँह धोवत समय ई उभरल प्रकट भइल कुच लाग्अता जइसे दूगो बड़ बड़ सोना के कटोरा उलीट के धइल होखे।

जुवती एकांत में अपना कुच बार बार निरखत बिआ आ अमरित धारन करे वाला दूनो पयोधर (अस्तन) के निहार निहार के खुश होत बिआ कि कइसे ई पहिले बइर जइसन, फेर नारंगी जइसन दिनेदिन कामदेव(अनंग) एकरा के अगोरत बारन। डाँड़ (कमर) के गुरुता (मोटाई) नितंब (चूतड़) ले लिसलस। एगो के छीन दोसर के अवलंब हो गइल। (कटिकेर गौरब पाओल नितंब, एकक खीन अओक अबलंब)। ई उठल कुच कपड़ा से झँपला से झँपात नइखे, बार बार देखाई देता। जइसे जतने ओकरा के छुपावे के होता ओतने हिमगिरि अस नुका नइखे पावत।

एकरा अलावे उनकर काल नायिका के पांव के नोह से माथ के चोटी तक का एक एक अंग-प्रत्यंग के रसाह नखशिख बखान, नहाय बात के समय के देह के अधनंगी भा साड़ी के चिपके से उभरल पानियो में तपत देह से निकलते कामाग्नि के भाप सद्य स्नाता, प्रेमालिंगन, केलि क्रीड़ा आ नग्नावस्था में नोक झोंक आदि आदि के बरनका पर भोजपुरी के केतने गुडू रंगिला, खेसारी, कालू आ तिवारी बयना फेर दीहें आ ई सब पदावली ओह जमाना मेंं मैथिल कोकिल लिखले रहस। जदि उनका पदन से भोजपुरी कोकिल महेन्दर मिसिर का पूर्वी, दादरा, टप्पा, कजरी, विरहा, होली गीत, चिंता, बारहमासा जंतसार आदि आ जनकवि भिखारी ठाकुर का रचनन के तुलनात्मक अध्ययन करब तो मिसिर जी आ ठाकुर जी के मान-मरजाद बहुते बढ़ जाई। खैर मिसिर जी आ ठाकुर जी से मैथिल कोकिल जी का पालन के तुलना त बाद के बात बा। अबहीं हम कवि कुलश्रेष्ठ महाकवि कालिदास के प्रबंध काव्य कुमारसम्भवम् का आठवां-नउवां सर्ग का कुछ श्लोकन के भोजपुरी अनुवाद नमूना के रूप मेंं रख रहल बानी। एकरा के पढ़के अश्लीलता – श्लीलता के निर्णय सुधी पाठक लोग खुले लगा ली।

कुमारसंभवम् प्रबंध काव्य का आठवां सर्ग के प्रसंग ई बा कि शिव-पार्वती के विवाह हो गइल बा आ दूनों नवबधू के मिलन होता। फेर आगे के उल्लेख में हम अपना ओर से कुछ ना कहब। कालिदास जी के श्लोके कहल अपने सुनब-पढ़ब। आठवां सर्ग का कुछ श्लोकन के अर्थ भर हम आगे लिखब-

शिव जी जब रति क्रीड़ा खातिर पार्वती का साड़ी के गिंठिर खोले खातिर ढ़ोंरी के लगे हाथ दे जाती बाड़न त रोके के बहाना करते बाड़ी। बाकिर ना जाने गिंठिर पहिलहीं से ढ़ीला होके खुले लाग था।4।

शंकर जी चुम्मा लेते समय ओठ नइखन काटते। बर्तन मृत समय नोंह गड़ाके के घवाहिल नइखन करत। लाहें लाहें सहे का हिसाब से से संभोग कर रहल बाड़न। बाकिर एकरा उल्टा ओठ काटे, बर्तन मिले आ तेज कठोर रति क्रिया से घबड़ा-चिला उठता बाड़ी।9।

ओह समय कपड़ा हटा गिला से पार्वती का जाँघन पर संभोग के समय लागल नोंह के चिन्ह के धारी के शिव जी खूब लोभाइल नजर से देखें लगलें आ पार्वती जी ढ़के लगी तो ढ़ंके से रोक देले।87। आदि

ई कुल्ह श्लोक बा जवना में बात पर्दा में कहल बा। आगहुं का सर्गन में बहुत तरह से एह प्रसंगन के चर्चा बा। चुंकि भोजपुरी सहज-स्भावाविक समझ में आवे वाला भाषा बा एह से सब उघार लउके ला। मैथिली कम लोग बुझेला एह से सभे जान ना पावे। संस्कृत के कालिदास आदि कवि तक सबके पहुंच ना हो सके। बाकिर भोजपुरी के महेन्द्र मिसिर होखस चाहे भिखारी ठाकुर होखस।केहू मर्यादा के उलंघन करत नइखे नजर आवत। बात पर्दा मेंं कहाइल बा।

बहुत अश्लीलता आ श्लीलता के सवाल प्रसंग, संदर्भ, समय, आ समाज के हिसाब से आपन लच्छन दरसावेला। इंसान विकल जी एगो मुक्तक कहके आपन बात पूरा करेंगे चाहब-

हवा के झोंका पर सागर में लहर जागेला।
बसंत के भोर विरहिन का जहर लागेला।।
काजर आ महावर दूनों ठीक लागे ठाँव पर।
रूप बिगाड़ देता जब दूनो कुठहर लागेला।।

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