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देवेन्द्र कुमार राय जी के लिखल कुछ भोजपुरी कविता

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देवेन्द्र कुमार राय जी
देवेन्द्र कुमार राय जी

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रउरा कहां सेयान बानी?

रउरा ना बुझबि सियासत
रउरा अबहीं इंसान बानी,
नेता खाली लाल बुझक्कड़
रउरा कहां सेयान बानी।।
जनता जाहिल भकचोन्हर
नेता नीमन सभमे सुनर,
नेता छोडि़ सभे बा द्रोही
नेताजी ग्यान बिग्यान बानी,
रउरा कहां सेयान बानी।।
रउरा सुनी इन्हिकर बात
नीमन सीखइहें जात पात,
एकरा से बड़ त सास्तर नइखे
हमनी के इन्हिकर लगान बानी,
रउरा कहां सेयान बानी।।

नयका सोंच

जवना के हम नीमन बुझनी
आजु उ सभ बेकार हो गइल,
जेकरा जानत रहनी आपन
उहे बड़का हतेयार हो गइल।।

भरल-पूरल बस्तर पहीरल
बांचल ना कवनो काम के,
जे जतना लंगटे घूमत बा
उहे आजु सिंगार हो गइल।।

सीधा-साधा लोग फांसे के
अब नयका चलन भइल बा,
इहे नयका जुग के भइया
अब त मूल हथियार हो गइल।।

फरीछ भइल फिफीहिया

खरकटल खरवरिया से
अब भराता रोज गिलास,
कतनो सहोरीं अंकवारी में
केहू बा ना आपन खास।।
रात रकटल भोर भटकल
दुपहरिया अगराइल बा,
गधपुरना के गढ़ लिखाइल
भइल महल के नाश।।
मेहनत के मथनी मुरुकल
ग्यान के गगरी चटकल बा,
फरीछ फिफीहिया बनिके फेंकरे
होता गजब आभास।।
उठल बंडे़रा सोंच के
फफकत फारत आइल,
पतई पतई भइल नापाता
अइसन बहल बतास।।
जेने देखीं सभे खोजे
जाने हीरा रतन हेराइल बा,
पांजरा के बोरसी केहू ना देखे
तापे सभे आकाश।।
सभ्यता के सांप डंसलसि
संस्कार गइल मुरुछाइ,
जेनही ताकीं ओनही
लउके मानवता के लाश।।

करेजवा सुसुकता

करीं धरीं चाहे कतनो मरीं
ना सोंच के जांगर घुसुकता,
दुशासन के शासन में हमार
करेजवा रहि रहि सुसुकता।।
सुघर सोंच बिला गइले
समय के अइसन फेरा बा,
झमकि झमकि के झूठ चले
आ जहर भाव के टुसुकता।।
लुट खसोट चम चम करे
ईमान के घर भइल आन्हार,
करम के फेंड ठूँठ भइल
कपट काल के मुसुकता।

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