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दीपक तिवारी जी के लिखल खिचड़ी प एगो कविता

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दीपक तिवारी जी
दीपक तिवारी जी

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स्नान दान के परब
हउँए मकर संक्रांति,
पूजा पाठ क के एहँ दिन
मिले मन के शांति

अलगे अलग नाँव से
एकरा के मनावल जाला,
जगहे जगहें तरह तरह से
एह परंपरा के निभावल जाला

उत्तर भारत में ई परब
लोहड़ी खिचड़ी नाँव से मने,
पतंग बाजी के दिन कहाला
अउरी घर घर खिचड़ी बने

दक्षिण भारत में एके
लोग पोंगल नाँव से जानेला,
खिचड़ी के एह तेव्हार के
अलगे भाव से मानेला

मकर संक्रांति के पावन परब प
लाई बन्हाँला तीली के,
बड़ी खाए में निमन लागेला
मिल जाई त ढीली के

नहान करे चले के बा
देखे माघ के मेला,
साल भर में आइल बा
शुभ अवसर ई बेला

लइकन में उत्साँह रहे
बा मेला घूमे खतिरा जाए के,
खेल खेलवाड़ खूब किनाइ
मिली चाट समोसा खाए के

उत्तरायन के इंतजार में
भीष्म पितामह परान ना छोड़ले,
उत्तरायन जबे भइल तबे
मुँहवा मोड़ले

गीता में श्रीकृष्ण कहँले बाड़े
की पुनर्जन्म ना होला,
जे उत्तरायन में परान त्यागे
ओके ब्रम्ह प्राप्त होला

छत के उपर चढ़ के
लोगवा पतंग उड़ावें ला,
एक दूसरा के पछाड़े खतिरा
पतंग से पतंग लड़ावें ला

शुभ दिन महीना शुरू होला
खिचड़ी के दिन से,
किसान खुशी में झूमे
उत्साहित होला खेतन के सीन से

बड़ा नीक लागेला देख के
खेल पतंग बाजी के,
केहूँ केहूँ से कम ना होला
सोचेला मार ली हम बाजी के

दान पून कइल जाला
अउरी गंगा जी में नहान,
हाथ जोड़ के देवता पितर के
कइल जाला धेयान

जरूरी नइखे दीपक कहेले
ढे़र चिउरा दही खइला के,
ठंडा के मौसम चलता
डर बा तबियत खराब भइला के

जय भोजपुरी -जय भोजपुरिया
दीपक तिवारी,श्रीकरपुर, सिवान

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